ये कौन आया रेगिस्तान मे हरियाली सी छा गई,
उसकी कातिल अदाएँ मेरे दिल-ओ-दिमाग पे छा गई,
कही जोश-ऐ-जूनून मे कुछ कर न बैठु मैं,
ऐ दोस्त इश्क-ऐ-जूनून मे सब कुछ कर न बैठु मैं,
May 29, 2008
ये कौन आया रेगिस्तान मे…
अंधेरे मे छुप गया चाँद मेरा…
अंधेरे मे छुप गया चाँद मेरा,
हुआ उदास न जाने क्यों दिल मेरा,
जानता हूँ न तू मेरी और न मैं तेरा,
दीदार-ऐ-यार को तरसे क्यों दिल मेरा,
रौशनी की एक किरण उस पर आई,
झलक देख क्यों न भरा दिल मेरा,
दूर रह कर भी…
दूर रह कर भी,
कितने करीब हो तुम,
आज ये जान पता हूँ,
जब तेरी यादों को,
सीने से लगाता हूँ,
करीब रह के भी,
न जान पाया तुझे,
आज ये सोच कर,
सिर्फ़ पछताता हूँ,
May 26, 2008
थक गया हूँ मुझे अब सोने दो…
थक गया हूँ मुझे अब सोने दो,
नींद के गावं मे खोने दो,
थक गया हूँ मुझे अब सोने दो,
परियों की गोद मे खोने दो,
थक गया हूँ मुझे अब सोने दो,
सुनहरे कल के सपनो मे खोने दो,
थक गया हूँ मुझे अब सोने दो,
सबने खूब प्यार दिया तुम अब रहने दो,
थक गया हूँ मुझे अब सोने दो,
मीठे मीठे सपनो मे खोये रहने दो,
थक गया हूँ मुझे अब सोने दो,
May 24, 2008
क्या कहूँ उसे…
क्या कहूँ उसे?
लगे परियों सी सुंदर वो,
कभी लगे नटखट गुडिया वो,
कभी वो हँसाती कभी रुलाती,
रोता देख वो खूब हँसाती,
ज़िंदगी क्या है वो सिखाती,
जीवन के सब रंग लायी…
जीवन के सब रंग लायी, देखो होली आई,
लगा के ये रंग क्यों न आज, हम फिर जी उठे,
खेल के ये रंगी होली क्यों न आज, हम फिर जी उठे,
रंगो के इस त्यौहार मे, सब रंगे हुए है,
हम भी रंगे हुए क्यों फिर, बेरंग से है,
ये रंग क्यों सबको दिखे, हमे न दिखे,
चल पड़ा हूँ फिर उन्ही रास्तों पर…
चल पड़ा हूँ फिर उन्ही रास्तों पर,
मंजिल का है पता मुझे, रास्ते का भी पता मुझे,
पहुच जाऊंगा वक्त पर, है सबको ख़बर,
फिर सोचता हूँ,
कितना सफर और बाकि है, इस ज़िंदगी का,
न जाने क्यों? साथी खोजती है ये निगाहे,
जाना है अकेले फिर भी,
न जाने क्यों? साथ खोजती है ये निगाहे,
May 23, 2008
रिमझिम रिमझिम वर्षा आई…
रिमझिम रिमझिम वर्षा आई,
देखो बरखा बाहर आई,
हम भीगे तुम भीगे,
भीग गया जग सारा,
छोटी छोटी बूंदों मे,
बरस गया प्यार सारा,
हम भीगे तुम भीगे,
भीग गया संसार हमारा,
भीगे भीगे मौसम मे,
तन भीगा मन भीगा,
आँखें भीगी दिल भीगा,
भीग गया रिश्ता हमारा,
आज है वो कुछ उदास उदास से…
आज है वो कुछ उदास उदास से
न जाने क्यों नही दे देते ये उदासी मुझे वो
आज है वो कुछ रूठे रूठे से
न जाने क्यों नही नही मान जाते अब वो
आज है वो कुछ अलग अलग से
न जाने क्यों नही हो जाते पहले जैसे वो
आज है वो कुछ बुझे बुझे से
न जाने क्यों नही हंस के दिखा देते अब वो


