चल पड़ा हूँ फिर उन्ही रास्तों पर,
मंजिल का है पता मुझे, रास्ते का भी पता मुझे,
पहुच जाऊंगा वक्त पर, है सबको ख़बर,
फिर सोचता हूँ,
कितना सफर और बाकि है, इस ज़िंदगी का,
न जाने क्यों? साथी खोजती है ये निगाहे,
जाना है अकेले फिर भी,
न जाने क्यों? साथ खोजती है ये निगाहे,
May 24, 2008
चल पड़ा हूँ फिर उन्ही रास्तों पर…
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